The Bishnupur Kingdom
Bishnupur kingdom
शुरुआती दौर में विष्णुपुर गुप्त राजाओं के अधीन आता था यहां के राजा समुद्र गुप्त के अधीन रह कर उसे कर दिया करते थे..
लेकिन बाद में ये खित्ता एक खाना जांगी यानी ग्रह युद्ध का शिकार हो गया… और एक लम्बे वक्त तक एक आज़ाद रियासत और जागीरदारी में फसा रहा कभी जागीर बनता तो कभी आज़ाद रियासत..
फिर काफी अरसे बाद तकरीबन 7 वी शताब्दी में मल्ला समराजय या मल्ल्भूम के रूप में उभरा !
मल्ला एक संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका मतलब होता है पहलवान, लेकीन, माना जाता के के शायद स्थानीय माल जनजातियों के साथ कुछ संबंध हो सकते हैं। इस लिए उन्हें *मल्लभूम* कहा जाता है।
खैर मल्ला साम्राज्य को छह बड़े घाटोवाला में बांटा गया था, जिनके नाम बंटोर, बांकदाहा, चुआ मसान, खातुल, जरबेलिया और बैशग्राम थे। इनमें नंबर 1 से लेकर नंबर 5 तक बारा हजारी कहलाते थे, जो सीधे तौर पर मल्ल राजाओं के शासन के अधीन आते थे।
लेकिन ये मल्ला राजा है कौन कहां से आए और इतना बड़ा साम्राज्य कैसे कायम कर दिया…?
इनकी सत्ता पे आने में दो कहानियां आवाम उन नास में मशहूर है,
मल्ल वंश के पहले राजा 7 वीं शताब्दी ईसवी में एक छोटे से साम्राज्य की सत्ता पे बैठे जिसकी हुदूद महज़ कुछ गांव और जंगल थे।
उनके तख्तनशीन होने के हालात मौज'ज़ाना थे, कहा जाता है के उनके वालीद ए बुज़ुर्ग ( पिता ) एक राजपूत राजकुमार थे,
एक दफा पूरी में जगन्नाथ मंदिर को ज़ियारत को गए, उनके साथ उनकी गर्भवती पत्नी थी, हालत कुछ यूं हुए के राजकुमार शदीद बुखार के वजह से वहां फस गए। जब उन्हें हमल का दर्द (प्रवास पीड़ा) शुरू हुआ तो उन्होंने अपनी एहेलिया (पत्नी) को जंगल में छोड़ दिया।
वक्त ए पैदाइश मां का इंतकाल हो गया लेकीन बच्चा जिंदा बच गया, कुछ देर बाद वहां लकड़ियां काट ते हुए एक बागड़ी जात की महीला आई, नवजात के रोने की आवाज़ सुन के जब वो पास आई तो देखती है एक खूबसूरत बच्चा पड़ा रो रहा है, उसकी मां अब इस दुनिया में नहीं थी…साथ में कुछ सामान था वो महिला उस बच्चे को और समान को ले के अपने घर चली आई।
उसका पालन पोषण उन्होंने ही किया राजकुमार बागड़ी जाति के बीच पाला बढ़ा इसी लिए उन्हे बागड़ी राजा भी कहा जाता है।
दर असल राजवंश के राजाओं को अक्सर ही आम आवाम के द्वारा बागड़ी राजा ही कहा जाता था। और फिर बागड़ियों के शाही वंश से ताल मेल भी अच्छे रहे हैं।
बेहेरहाल वापस कहानी पे आते हैं, राजकुमार के साथ जो समान था उसमें एक राजपूत तलवार और राजपूताना चिन्ह था, ये सामान राजकुमार के पिता ने शायद उसकी पहचान के लिए छोड़ा होगा, के कोई उसे पहचान ले, और ये ख्वाहिश तब पूरी होती है जब एक ब्रह्मण पुजारी ने देखा के वो बच्चा बाकी बागडियों से अलग है तो उसे राजपुर चिन्हों के साथ अपने घर ले आया…!
कहते हैं के इससे पहले कई मौज'ज़ात उस बच्चे के साथ हुए, और कई वंश ने उसके एक राजा बनने को पेंशनगो'ई (भविष्यवाणी) भी की।
एक दफा वो नदी किनारे मिले सोने की डली घर ले आया था और एक दफा नदी से सुनहरा चिन्ह निकल लाया था, और एक बार जब वो जंगल में गाय चराने गया था और सुस्ताने के लिए सो गया था तो उसके सर के ऊपर एक बोहोत बड़ा अजगर खड़ा देखा गया।
बहरहाल ब्राह्मण के ले जाने के बाद उसके पालन करने वाले पिता के लिए ये सब बोहोत बुरा और डरवाना था जब बच्चा वक्त पे घर नहीं लौटा तो उन्होंने उस बच्चे को हर जगह ढूंढा लेकीन उन्हें उसका कुछ पता न चला।
एक दिन जब वहां के राजा की मृत्यु हो गई तो ब्रहामणो को बुलाया गया उसमे वो ब्रह्मण उस बच्चे को साथ ले कर गए, अब हुआ यूं के मृत राजा के शाही हाथी ने भीड़ में से उस बच्चे को अपने सूंध से उठाया और धीरे से राज हिंहासन पे बैठा दिया!
लोगो ने उसे राजा तस्लीम कर लिया
इसे बागड़ी राजा के नाम से जाना जाने लगा…. और इसी का आगे चल कर शाही नाम आदि मल्ला रखाया और यहां से एक सम्राजय की शुरुआत हुई।
*मल्लभूम साम्राज्य*
मल्ला राजा वैष्णव थे, और उन्होंने 17 वीं और 18 वीं सदी के दौरान इस जगह पे मशहूर टैराकोटा मंदिरों को तामीर करवाया। बिपोदतारिणी देवी की किंवदंतियाँ बिष्णुपुर के मल्ला राजाओं से जुड़ी हुई हैं।
तक़रीबन एक हज़ार साल तक ये ( विष्णुपुर) मालभूम के मल्ला राजाओं की राजधानी बनी रही, जिसमें बकुड़ा एक हिस्सा था। फिर मुग़ल काल के आख़िर दौर में आ के ये कमज़ोर हो गई थी।
मल्ला राजा वीर हमवीर और उनके जनशीं राजा रघुनात सिंह देव और बीर सिंह देव की सरपरस्ती के विष्णुपुर को बंगाल में सकाफत के बड़े मरकज़ ( संस्कृति के प्रमुख केंद्र) में से एक बना दिया। ज़्यादा तर शानदार टैराकोटा मंदिर जिनके लिए ये शहर मुंशीफाना तौर पर मशहूर है! इसी दौरान तामीर किए गए थे।
यहां राजाओं के मृणमयी मंदिर को एक कीमती ऐतिहासिक स्थान माना जाता है।
फिर शाही सरपरस्ती ने 18 वीं सदी के आखिर में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत या कहें क्लासिकल मोसिकी के विष्णुपुर घराने और स्कूल ऑफ विष्णुपुर पेंटिंग को भी जन्म दिया।
तक़रीबन सातवीं सदी ईसवी से ले कर ब्रिटिश राज के आमद तो, जो के तकरीबन 1 हज़ार साल है। बकूड़ा ज़िला विष्णुपुर और उसके मल्ला राजाओं के अधीन राहा। बिपोदतारिणी देवी की किंवदंतियाँ बिष्णुपुर के मल्ला राजाओं से जुड़ी हुई हैं।
1997 से, बिष्णुपुर के मंदिर यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट की अस्थायी सूची में हैं।





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