CHHDIYAN Ka Mela ( छड़ियां का मेला )

 ।।छड़ियां का मेला।।


"साइयां चाहे मारो पीटो, मैं तो छाइयां देखन जाऊंगी 

अनारसे की गोलियां, मदरसे में खाऊंगी  ।। "



आज दरबार मख़दूम साबिर पाक के दर से हर साल की तरह इस साल भी छड़ियां निकल गई हैं, इसी तरह से हिंदुस्तान के हर सूफी दरगाह आस्ताने और खानकाह से छड़ियां लिए सूफियों फकीरों कलंदरो मलंग मस्तान हैदरी और उनके और उनके दर के खिदमत गुज़ारों का एक जत्था हाथों के आलम और छड़ियां ले कर अपने अपने अस्तानो को छोड़ कर पैदल 40 दिन के सफर में निकलते हैं। हिंदुस्तान के तमाम अस्तानों की छड़ियां का जत्था दिल्ली के महरौली में मोजूद हज़रत ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी रेहमतुला आल्हे के आस्ताने ए पाक पे आकर जमा होते हैं, और फिर यहां से सब एक साथ पैदल ही अजमेर की जानिब रवाना हो जाते हैं। जब से छड़ियां अजमेर शरीफ पोहोंच जाती है तो उसी के साथ अजेमर में अल हिंद के सूफियों का सब से बड़ा तेहवार ख़्वाजा गरीब नवाज़ मुईनुद्दीन चिश्ती rz का उर्स शुरू होता है। इस्लामिक तारीख के 6 रज्जब को बड़ा उर्स शरीफ़ मनाया जाता है।


दिल्ली सल्तनत के पहले सुलतान अल्तमस के ज़माने से ही ये सिलसिला दिल्ली में चलता आ रहा है,


जब ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी खुद दिल्ली से अजमेर अपने पीर की बारगाह में पोहोचते थे।


बाद में इस वक्त जब छड़ियां दिल्ली पोहोंचती थी तो दिल्ली में मेला लग जाया करता था,और ये आख़िर के मुग़ल बादशाह के ज़माने में अपने चरम पे थे।


मेला सैर ए गुल फरोशं ( फूल वालों की सैर) की तरह ही यहां भी शाहजहानाबाद को छोड़ के लोग मेहरोली की तरफ़ निकल पड़ते थे, और बादशाह की सवारी भी निकल पड़ती थी,


जगह जगह ठहर ठहर के मसलन ख़्वाजा मेहबूब ए इलाही की बारगाह ओ ख्वाजा मखदूम नसीरुद्दीन की बारगह और कुछ पुराने… क़िले और मकबरों से होते हुए महरौली पोहोंचा करते थे।


ऐसे ही एक मकबरा जो अवध के नवाब सफदरजंग का मकबरा है जिसे आज सफदरजंग के नाम से जाना जाता है। वहां पे बहादुर शाह ज़फ़र की सवारी ठहरा करती थी… उस ज़माने में उसे मदरसा कह कर पुकारा जाता था… मदरसे के बाहर बोहोत ही उम्दा अनारसे की गोलियां मिलती थी। लोगों का हुजूम वहां लग जाता था।


तभी से ऊपर लिखी ये बात मशहूर हुई..


साइयां चाहे मारो पीटो,मैं तो छड़ियां देखन जाऊंगी

अनारसे की गोलियां, मदरसे पे खाऊंगी।।"


बादशाह के द्वारा छड़ियों का इस्तकबाल किया जाता था और फिर जब छड़ियां दिल्ली से अजमेर की ओर रवाना होती थी तो भी बादशाह इसे रुकसत करते थे।


अंग्रेज़ी हुकीमरान के बाद फूल वालों की सैर का मेला बंद करवा दिया गया था लेकिन छड़ियां का सिलसिला हुज़ूर ख़्वाजा कुतुब साहब की सुन्नत ऐसे ही चलती रही। हां बस मेला लगना बंद हो गया।


इस बार जानवारी में गरीब नवाज़ के 811 urs मुबारक को मनाया जाएगा और इसकी तैयारियां शुरू हो चुकी है दरबार मख़दूम साबिर पिया के दरबार से (कलियर शरीफ़) छड़ियां रवाना हो चुकी हैं धीरे धीरे 

हिंदुस्तान के तमाम आस्ताने से और दरगाह से ये जत्थे रवाना होंगे और दिल्ली में ख़्वाजा कुतुब उल अक्ताब कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के दरबार में आ के एक साथ अजमेर शरीफ़ के लिए निकलेंगे।।


Zain ul abedin..

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